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Full Panchangपूरा पंचांग

64 योगिनियाँ कौन हैं?

संक्षेप में उत्तर

योगिनियाँ शाक्त-तंत्र परंपरा की देवियाँ हैं, जिन्हें प्रायः देवी की सहचरी या उनकी शक्तियों का विस्तार कहा जाता है।
इनका सबसे ठोस प्रमाण कल्पना में नहीं, पत्थर में है — भारत में आज भी खड़े गोल आकार के योगिनी मंदिर।

शास्त्रीय संदर्भ के साथ

परंपरागत मान्यता

गिनती प्रायः 64 कही जाती है, पर 42 और 81 वाली सूचियाँ भी मिलती हैं। नाम भी हर सूची में एक जैसे नहीं हैं।

परंपरा में इन्हें दुर्गा या काली से जोड़ा जाता है, और उनकी उपासना तंत्र-परंपरा में रही है — सामान्य गृहस्थ पूजा में नहीं।

शास्त्रीय संदर्भ

इस विषय का सबसे मज़बूत प्रमाण स्थापत्य है। योगिनी मंदिर आज भी खड़े हैं और देखे जा सकते हैं — हीरापुर (ओडिशा), रानीपुर-झरियाल (ओडिशा), भेड़ाघाट (मध्य प्रदेश) और मितावली/मोरेना (मध्य प्रदेश)।

इनकी बनावट भारतीय मंदिर-स्थापत्य में असामान्य है: ये गोल हैं, बिना छत के, और मूर्तियाँ गोलाई में दीवार के साथ रखी हैं। यह ढाँचा किसी और परंपरा के मंदिरों जैसा नहीं है।

यानी यह परंपरा केवल कथा में नहीं थी — उसके लिए मंदिर बने, और वे आज भी मौजूद हैं।

सरल व्याख्या

गोल और खुली छत वाला ढाँचा अपने आप में बताता है कि यहाँ की उपासना सामान्य मंदिर जैसी नहीं थी। एक सामान्य मंदिर में गर्भगृह होता है और उसमें एक मुख्य मूर्ति; यहाँ मुख्य कोई एक नहीं, सब गोलाई में हैं।

मितावली/मोरेना के गोल मंदिर के बारे में यह भी कहा जाता है कि दिल्ली की संसद भवन की गोल बनावट उससे प्रेरित है। यह बात बहुत दोहराई जाती है, पर हम इसे प्रमाणित नहीं कह सकते — इसलिए इसे मान्यता में रख रहे हैं।
क्या प्रमाणित है
यह कि योगिनी मंदिर वास्तव में हैं और देखे जा सकते हैं — हीरापुर, रानीपुर-झरियाल, भेड़ाघाट, मितावली। और यह कि इनका गोल, खुली छत वाला ढाँचा भारतीय मंदिर-स्थापत्य में असामान्य है।
क्या लोकमान्यता है
गिनती (64 बनाम 42 बनाम 81) और नामों की सूचियाँ परंपरा के अनुसार बदलती हैं। संसद भवन की बनावट का मितावली से प्रेरित होना भी एक प्रचलित बात है, प्रमाणित तथ्य नहीं।

संदर्भ

  • योगिनी मंदिर — हीरापुर, रानीपुर-झरियाल, भेड़ाघाट, मितावली (आधुनिक — modern/secondary source)
    विद्यमान स्थापत्य; गोल एवं खुली छत वाला असामान्य ढाँचा।
  • 64 की गिनती एवं नाम-सूचियाँ (लोकमान्यता — tradition, no text claimed)
    परंपराओं में भिन्न — 42 और 81 वाली सूचियाँ भी मिलती हैं।

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जाँचा हुआ बदलिए या संदर्भ जोड़िए

जहाँ शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, हम उसे लोकमान्यता कहकर लिखते हैं — और जहाँ ग्रंथों में मतभेद है, वह भी बता देते हैं।