संक्षेप में उत्तर
तुलसी वैष्णव परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण पौधा है — विष्णु और कृष्ण की पूजा तुलसी-पत्र के बिना पूरी नहीं मानी जाती।
तुलसी विवाह, आँगन में तुलसी-चौरा और संध्या-दीपक — ये तीन परंपराएँ आज भी सबसे व्यापक हैं।
यह लोकमान्यता है — शास्त्रीय प्रमाण हमें नहीं मिला
परंपरागत मान्यता
कार्तिक शुक्ल एकादशी को तुलसी विवाह होता है, और उसी से विवाह-मुहूर्तों का मौसम आरंभ माना जाता है।
घर के आँगन में तुलसी-चौरा और उस पर संध्या-दीपक की परंपरा उत्तर और पश्चिम भारत में बहुत प्रचलित है।
तुलसी-पत्र चरणामृत और प्रसाद में डाला जाता है। रविवार और एकादशी को पत्ते न तोड़ने की मान्यता भी व्यापक है।
शिव-पूजा में तुलसी सामान्यतः वर्जित मानी जाती है — यह भेद वास्तविक है और इसका कारण परंपरा में कथा से जोड़ा जाता है।
शास्त्रीय संदर्भ
इस विषय पर हमें कोई निश्चित ग्रंथ-संदर्भ नहीं मिला। नीचे जो लिखा है वह
परंपरा और व्यवहार पर आधारित है — शास्त्र-वचन के रूप में न लें।
सरल व्याख्या
तुलसी की एक बात ध्यान देने लायक है: यह अकेला ऐसा पौधा है जिसे भारतीय घर में देवता की तरह स्थान मिला — मंदिर में नहीं, आँगन में। उसकी पूजा घर की स्त्री करती रही है, बिना किसी पुरोहित के।
यानी यह परंपरा मंदिर-व्यवस्था से बाहर, सीधे घर में चलती रही — और शायद इसीलिए इतनी टिकाऊ रही।
तुलसी के औषधीय गुणों की चर्चा आयुर्वेद में मिलती है, पर हम यहाँ किसी विशेष ग्रंथ का संदर्भ नहीं दे रहे, क्योंकि हम उसे निश्चित नहीं कर सके।
क्या प्रमाणित है
यह कि तुलसी वैष्णव पूजा-पद्धति का अनिवार्य अंग है; कि तुलसी विवाह कार्तिक शुक्ल एकादशी को होता है; और कि शिव-पूजा में तुलसी का वर्जन एक वास्तविक और व्यापक भेद है।
क्या लोकमान्यता है
किस दिन पत्ते न तोड़ें, तुलसी सूख जाने का अर्थ, और घर में तुलसी होने से मिलने वाले फल — ये परंपरागत मान्यताएँ हैं। शिव-पूजा में वर्जन का कथा-आधारित कारण भी परंपरा है। हमें इनके लिए कोई निश्चित ग्रंथ-संदर्भ नहीं मिला।
जहाँ शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, हम उसे लोकमान्यता कहकर लिखते हैं —
और जहाँ ग्रंथों में मतभेद है, वह भी बता देते हैं।