संक्षेप में उत्तर
सीधा उत्तर: हमें इसका कोई शास्त्रीय आधार नहीं मिला।
यह एक लोक-परंपरा है — बहुत व्यापक, बहुत पुरानी, पर लोक की। इसे शास्त्र-विधान कहकर प्रस्तुत करना ठीक नहीं होगा।
यह लोकमान्यता है — शास्त्रीय प्रमाण हमें नहीं मिला
परंपरागत मान्यता
दुकान, वाहन और घर के द्वार पर नींबू और सात मिर्च टाँगने की रीति पूरे उत्तर और पश्चिम भारत में मिलती है। प्रायः शनिवार को इसे बदला जाता है।
इसे "नज़र" से बचाव का उपाय माना जाता है। कहीं-कहीं इसे अलक्ष्मी से जोड़ा जाता है — कि वे खट्टा-तीखा पाकर बाहर ही रह जाती हैं और भीतर नहीं आतीं।
शास्त्रीय संदर्भ
इस विषय पर हमें कोई निश्चित ग्रंथ-संदर्भ नहीं मिला। नीचे जो लिखा है वह
परंपरा और व्यवहार पर आधारित है — शास्त्र-वचन के रूप में न लें।
सरल व्याख्या
दो बातें अलग रखनी चाहिए।
पहली — यह परंपरा वास्तव में है, और बहुत पुरानी है। किसी के घर के आगे टँगा नींबू-मिर्च देखकर उसका उपहास करने का कोई कारण नहीं। परंपराएँ शास्त्र से ही नहीं बनतीं; वे लोक से भी बनती हैं और यह उनका सम्मानजनक रूप है।
दूसरी — इसे "शास्त्र में लिखा है" कहना गलत होगा, क्योंकि वैसा कोई संदर्भ हमें नहीं मिला।
एक व्यावहारिक व्याख्या भी कही जाती है — नींबू और मिर्च की गंध कीटों को दूर रखती है। यह सुनने में तर्कसंगत लगता है, पर यह भी एक व्याख्या ही है, कोई सिद्ध बात नहीं। हम इसे भी प्रमाण के रूप में नहीं रख रहे।
क्या प्रमाणित है
यह कि नींबू-मिर्च टाँगना भारत की एक व्यापक और पुरानी लोक-परंपरा है। इससे आगे इस विषय पर हमारे पास कुछ भी प्रमाणित नहीं है।
क्या लोकमान्यता है
नज़र से बचाव, अलक्ष्मी का बाहर रह जाना, शनिवार को बदलना, सात मिर्च की गिनती — सब कुछ लोकमान्यता है। और कीट भगाने वाली आधुनिक व्याख्या भी व्याख्या ही है, प्रमाण नहीं।
जहाँ शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, हम उसे लोकमान्यता कहकर लिखते हैं —
और जहाँ ग्रंथों में मतभेद है, वह भी बता देते हैं।