संक्षेप में उत्तर
चौरासी लाख योनियों की गिनती पुराण-परंपरा और लोक-परंपरा दोनों में बहुत प्रचलित है, और संत-साहित्य में बार-बार आती है।
परंतु यह गिनती किस ग्रंथ के किस स्थान पर पहली बार आई — यह हम निश्चित रूप से नहीं बता सकते।
यह लोकमान्यता है — शास्त्रीय प्रमाण हमें नहीं मिला
परंपरागत मान्यता
परंपरा में जीव के 84 लाख योनियों से गुज़रकर मनुष्य-जन्म पाने की बात कही जाती है, और इसी कारण मनुष्य-जन्म को दुर्लभ कहा गया है।
यह भाव भक्ति-काल के संत-साहित्य में बहुत मिलता है — मनुष्य जन्म व्यर्थ न जाए, यह उसका मूल संदेश है।
गिनती का विभाजन भी परंपरा में मिलता है — जलचर, वृक्ष, कीट, पक्षी, पशु और मनुष्य में इतनी-इतनी। यह विभाजन हर जगह एक जैसा नहीं है।
शास्त्रीय संदर्भ
इस विषय पर हमें कोई निश्चित ग्रंथ-संदर्भ नहीं मिला। नीचे जो लिखा है वह
परंपरा और व्यवहार पर आधारित है — शास्त्र-वचन के रूप में न लें।
सरल व्याख्या
इस अवधारणा का असली भार गिनती पर नहीं है, भाव पर है: जीव बहुत लंबी यात्रा करके यहाँ पहुँचा है, इसलिए यह जन्म बरबाद न किया जाए।
संत-साहित्य इसी को बार-बार दोहराता है — और वहाँ भी बात 84 लाख की गणना सिद्ध करने की नहीं, चेताने की है।
क्या प्रमाणित है
यह कि 84 लाख योनियों की अवधारणा भारतीय परंपरा में व्यापक और बहुत पुरानी है, और यह कि संत-साहित्य में यह मनुष्य-जन्म की दुर्लभता के संदर्भ में बार-बार आती है।
क्या लोकमान्यता है
गिनती स्वयं, और उसका जलचर-थलचर-नभचर में विभाजन — ये परंपरागत हैं। हम यह नहीं कह सकते कि यह किस ग्रंथ के किस अध्याय से आई। जो कोई निश्चित संदर्भ बताए, उसे स्वयं खोलकर देख लीजिए।
जहाँ शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, हम उसे लोकमान्यता कहकर लिखते हैं —
और जहाँ ग्रंथों में मतभेद है, वह भी बता देते हैं।