संक्षेप में उत्तर
ये दोनों चंद्रमा की दो अंतिम अवस्थाएँ हैं — पूर्ण अंधकार और पूर्ण प्रकाश। भारतीय पंचांग का पूरा ढाँचा इन्हीं दोनों के बीच बना है।
यह खगोलीय तथ्य है, मान्यता नहीं — और आप इसे इसी साइट के पंचांग में रोज़ देख सकते हैं।
शास्त्रीय संदर्भ के साथ
परंपरागत मान्यता
अमावस्या पितृ-कर्म, तर्पण और दान से जोड़ी जाती है; पूर्णिमा व्रत, सत्यनारायण कथा और स्नान-दान से।
कई बड़े पर्व इन्हीं दो तिथियों पर पड़ते हैं — दीपावली अमावस्या को, गुरु पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा और कार्तिक पूर्णिमा पूर्णिमा को।
शास्त्रीय संदर्भ
तिथि की गणना चंद्रमा और सूर्य के बीच के अंतर से होती है। जब यह अंतर शून्य होता है तब अमावस्या, और जब 180 अंश होता है तब पूर्णिमा।
यह गणना इस वेबसाइट के पंचांग में रोज़ चलती है — तिथि, उसका स्वामी और समाप्ति का समय वहीं से निकलते हैं। यानी यह अंश निश्चित है, किसी परंपरा पर निर्भर नहीं।
जो हम नहीं कह रहे: कि किसी विशेष तिथि पर कोई विशेष फल मिलता है। वह बात परंपरा की है, गणना की नहीं।
सरल व्याख्या
पूरा हिंदू महीना इन्हीं दो बिंदुओं से बनता है — शुक्ल पक्ष अमावस्या के बाद बढ़ता हुआ चंद्रमा, कृष्ण पक्ष पूर्णिमा के बाद घटता हुआ।
इसीलिए ये दो तिथियाँ केवल "शुभ दिन" नहीं हैं; ये वे खूँटे हैं जिन पर पूरा कैलेंडर टँगा है।
क्या प्रमाणित है
यह कि अमावस्या और पूर्णिमा सूर्य-चंद्र के 0° और 180° अंतर की स्थितियाँ हैं, और यह कि भारतीय मास का विभाजन इन्हीं दोनों से बनता है। यह गणना है, और इसी साइट के पंचांग में रोज़ जाँची जा सकती है।
क्या लोकमान्यता है
किस तिथि पर कौन सा कर्म कितना फल देता है, और अमावस्या का अशुभ होना — ये परंपरागत मान्यताएँ हैं। गणना इनके बारे में कुछ नहीं कहती।
जहाँ शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, हम उसे लोकमान्यता कहकर लिखते हैं —
और जहाँ ग्रंथों में मतभेद है, वह भी बता देते हैं।