संक्षेप में उत्तर
ये तंत्र-साहित्य के दो वर्ग हैं। परंपरा में इनका भेद संवाद की दिशा से बताया जाता है — आगम में शिव कहते हैं और पार्वती सुनती हैं, निगम में इसका उल्टा।
दक्षिण भारत के अनेक बड़े मंदिरों की पूजा-पद्धति आगम-ग्रंथों पर ही आधारित है।
शास्त्रीय संदर्भ के साथ
परंपरागत मान्यता
आगम-परंपरा तीन बड़ी धाराओं में गिनाई जाती है — शैव आगम, शाक्त आगम (जिन्हें प्रायः तंत्र कहा जाता है), और वैष्णव आगम (पांचरात्र और वैखानस)।
इनमें उपासना की विधि, मंदिर-निर्माण, मूर्ति-प्रतिष्ठा, नित्य पूजा और उत्सव — सब का विधान मिलता है।
शास्त्रीय संदर्भ
आगम और निगम का यह वर्गीकरण तंत्र-साहित्य में सर्वमान्य है, और तीनों सम्प्रदायों की अपनी आगम-परंपरा होना एक प्रलेखित तथ्य है।
दक्षिण भारत के प्रसिद्ध मंदिरों में आज भी पूजा आगम-विधि से होती है, और मंदिर के अर्चक उसी परंपरा में प्रशिक्षित होते हैं।
यहाँ किसी एक आगम-ग्रंथ का नाम, अध्याय या श्लोक नहीं दिया गया — बात वर्गीकरण की है।
सरल व्याख्या
सबसे उपयोगी बात यह समझना है कि आगम वेद के विरोधी नहीं माने जाते। परंपरा में दोनों को उपासना के दो अलग-अलग ढाँचे कहा गया है — वेद अधिक यज्ञ-केंद्रित, आगम अधिक मूर्ति और मंदिर-केंद्रित।
आज हम मंदिर में जो पूजा देखते हैं — मूर्ति, अभिषेक, अलंकार, आरती, उत्सव — उसका ढाँचा बहुत हद तक आगम-परंपरा से आया है।
क्या प्रमाणित है
यह कि आगम-निगम तंत्र-साहित्य के स्थापित वर्ग हैं; कि शैव, शाक्त और वैष्णव तीनों की अपनी आगम-परंपरा है; और कि अनेक दक्षिण भारतीय मंदिरों की पूजा-पद्धति आगम पर आधारित है।
क्या लोकमान्यता है
यह कि आगम वेद से कमतर या उसके विरोधी हैं — यह एक प्रचलित धारणा है, परंतु परंपरा में यह सर्वमान्य नहीं। इस पर मत भिन्न हैं और हम किसी एक को प्रमाणित नहीं कह सकते।
जहाँ शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, हम उसे लोकमान्यता कहकर लिखते हैं —
और जहाँ ग्रंथों में मतभेद है, वह भी बता देते हैं।