Todayआज Saturdayशनिवार
Pravisteप्रविष्टे 20 Bhadrapadaभाद्रपद Tithiतिथि Krishna Navamiकृष्ण नवमी → 9:54 PM Nakshatraनक्षत्र Mrigashiraमृगशिरा → 9:31 PM Sunriseसूर्योदय6:03 AM Sunsetसूर्यास्त6:35 PM Rahu Kaalराहु काल9:11 AM – 10:45 AM
Full Panchangपूरा पंचांग

आगम और निगम क्या हैं?

संक्षेप में उत्तर

ये तंत्र-साहित्य के दो वर्ग हैं। परंपरा में इनका भेद संवाद की दिशा से बताया जाता है — आगम में शिव कहते हैं और पार्वती सुनती हैं, निगम में इसका उल्टा।
दक्षिण भारत के अनेक बड़े मंदिरों की पूजा-पद्धति आगम-ग्रंथों पर ही आधारित है।

शास्त्रीय संदर्भ के साथ

परंपरागत मान्यता

आगम-परंपरा तीन बड़ी धाराओं में गिनाई जाती है — शैव आगम, शाक्त आगम (जिन्हें प्रायः तंत्र कहा जाता है), और वैष्णव आगम (पांचरात्र और वैखानस)।

इनमें उपासना की विधि, मंदिर-निर्माण, मूर्ति-प्रतिष्ठा, नित्य पूजा और उत्सव — सब का विधान मिलता है।

शास्त्रीय संदर्भ

आगम और निगम का यह वर्गीकरण तंत्र-साहित्य में सर्वमान्य है, और तीनों सम्प्रदायों की अपनी आगम-परंपरा होना एक प्रलेखित तथ्य है।

दक्षिण भारत के प्रसिद्ध मंदिरों में आज भी पूजा आगम-विधि से होती है, और मंदिर के अर्चक उसी परंपरा में प्रशिक्षित होते हैं।

यहाँ किसी एक आगम-ग्रंथ का नाम, अध्याय या श्लोक नहीं दिया गया — बात वर्गीकरण की है।

सरल व्याख्या

सबसे उपयोगी बात यह समझना है कि आगम वेद के विरोधी नहीं माने जाते। परंपरा में दोनों को उपासना के दो अलग-अलग ढाँचे कहा गया है — वेद अधिक यज्ञ-केंद्रित, आगम अधिक मूर्ति और मंदिर-केंद्रित।

आज हम मंदिर में जो पूजा देखते हैं — मूर्ति, अभिषेक, अलंकार, आरती, उत्सव — उसका ढाँचा बहुत हद तक आगम-परंपरा से आया है।
क्या प्रमाणित है
यह कि आगम-निगम तंत्र-साहित्य के स्थापित वर्ग हैं; कि शैव, शाक्त और वैष्णव तीनों की अपनी आगम-परंपरा है; और कि अनेक दक्षिण भारतीय मंदिरों की पूजा-पद्धति आगम पर आधारित है।
क्या लोकमान्यता है
यह कि आगम वेद से कमतर या उसके विरोधी हैं — यह एक प्रचलित धारणा है, परंतु परंपरा में यह सर्वमान्य नहीं। इस पर मत भिन्न हैं और हम किसी एक को प्रमाणित नहीं कह सकते।

संदर्भ

  • आगम — शैव, शाक्त एवं वैष्णव (पांचरात्र, वैखानस) (ग्रंथ — scripture, with chapter and verse)
    स्थापित वर्गीकरण; किसी एक ग्रंथ का संदर्भ नहीं दिया गया।

अब यह भी पढ़िए

जाँचा हुआ बदलिए या संदर्भ जोड़िए

जहाँ शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, हम उसे लोकमान्यता कहकर लिखते हैं — और जहाँ ग्रंथों में मतभेद है, वह भी बता देते हैं।