संक्षेप में उत्तर
यह कुछ वाम-मार्गी और अघोर परंपराओं की वह साधना है जिसमें श्मशान को साधना-स्थल बनाया जाता है — इसका उद्देश्य परंपरा में मृत्यु के भय और शुद्ध-अशुद्ध के भेद को तोड़ना बताया गया है।
यह पृष्ठ केवल ऐतिहासिक और वैचारिक परिचय है। इसमें कोई विधि, क्रम, मंत्र या प्रयोग नहीं दिया गया है, और न दिया जाएगा।
यह लोकमान्यता है — शास्त्रीय प्रमाण हमें नहीं मिला
परंपरागत मान्यता
अघोर परंपरा और कुछ शाक्त-कापालिक धाराओं में श्मशान को साधना के लिए चुना जाता रहा है। इसका कारण परंपरा में यह बताया गया है कि वहाँ मनुष्य के बनाए हुए भेद — सुंदर-असुंदर, शुद्ध-अशुद्ध, अपना-पराया — सब समाप्त हो जाते हैं।
काशी और तारापीठ जैसे स्थान इस परंपरा से ऐतिहासिक रूप से जुड़े रहे हैं।
यह परंपरा सदा ही अल्पसंख्यक रही है, और सामान्य हिंदू उपासना का अंग कभी नहीं रही।
शास्त्रीय संदर्भ
इस विषय पर हमें कोई निश्चित ग्रंथ-संदर्भ नहीं मिला। नीचे जो लिखा है वह
परंपरा और व्यवहार पर आधारित है — शास्त्र-वचन के रूप में न लें।
सरल व्याख्या
इस विषय पर तीन बातें साफ़ कहना ज़रूरी है:
१. यह सामान्य पूजा-पद्धति नहीं है। किसी गृहस्थ उपासक के लिए यह कभी निर्धारित नहीं की गई।
२. इसका उद्देश्य परंपरा में वैराग्य और भय-नाश बताया गया है — किसी को हानि पहुँचाना नहीं। जो लोग "श्मशान साधना" के नाम पर किसी पर प्रयोग करने का दावा करते हैं, वे इस परंपरा का प्रतिनिधित्व नहीं करते।
३. हम इसकी कोई विधि नहीं दे रहे। यह जान-बूझकर है। ऐसी सामग्री का सार्वजनिक रूप से छपना न सुरक्षित है, न उचित — और परंपरा में भी यह गुरु के बिना कभी नहीं दी गई।
यदि कोई व्यक्ति भय दिखाकर, या किसी पर "प्रयोग" का वादा करके धन माँगे, तो वह ठगी है। ऐसे में किसी जानकार से बात कीजिए, और आवश्यकता हो तो पुलिस से।
क्या प्रमाणित है
यह कि अघोर और कापालिक जैसी परंपराएँ ऐतिहासिक रूप से रही हैं; कि काशी और तारापीठ इनसे जुड़े रहे हैं; और कि ये सदा अल्पसंख्यक धाराएँ रहीं, सामान्य हिंदू उपासना का अंग नहीं।
क्या लोकमान्यता है
यह कि इस साधना से किसी को वश में किया जा सकता है या हानि पहुँचाई जा सकती है — यह लोकधारणा है और प्रायः ठगी का आधार बनती है। हम इसका कोई शास्त्रीय आधार नहीं जानते, और इस विषय की कोई विधि इस पृष्ठ पर नहीं है।
जहाँ शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, हम उसे लोकमान्यता कहकर लिखते हैं —
और जहाँ ग्रंथों में मतभेद है, वह भी बता देते हैं।