संक्षेप में उत्तर
यह वही दिशा है जिसमें प्रदक्षिणा की जाती है — देवता को दाहिनी ओर रखते हुए।
यानी आरती घुमाने की दिशा प्रदक्षिणा के नियम से आई है, किसी अलग विधान से नहीं। इसका कोई सर्वमान्य ग्रंथ-वचन हमें नहीं मिला।
यह लोकमान्यता है — शास्त्रीय प्रमाण हमें नहीं मिला
परंपरागत मान्यता
आरती की थाली को देवता के सामने घड़ी की दिशा में घुमाया जाता है, प्रायः चरणों से आरंभ करके मुख तक। कहीं-कहीं यह गिनती के साथ किया जाता है — चरणों में चार बार, नाभि पर दो, मुख पर एक और सर्वांग सात।
यह गिनती हर जगह एक जैसी नहीं है। कई परंपराओं में ऐसी कोई गिनती है ही नहीं, और आरती केवल भाव से उतारी जाती है।
शास्त्रीय संदर्भ
इस विषय पर हमें कोई निश्चित ग्रंथ-संदर्भ नहीं मिला। नीचे जो लिखा है वह
परंपरा और व्यवहार पर आधारित है — शास्त्र-वचन के रूप में न लें।
सरल व्याख्या
"दक्षिण" का अर्थ दाहिना भी है और दक्षिण दिशा भी। प्र-दक्षिणा यानी दाहिनी ओर रखते हुए चलना। सामने खड़े होकर थाली घुमाएँ तो वही गति घड़ी की दिशा बनती है।
यानी यह कोई अलग नियम नहीं है — एक ही नियम है, जो चलने पर प्रदक्षिणा कहलाता है और थाली पर आरती।
क्या प्रमाणित है
यह कि प्रदक्षिणा में देवता को दाहिनी ओर रखा जाता है, और आरती की दिशा उसी से मेल खाती है। दोनों एक ही सिद्धांत के दो रूप हैं।
क्या लोकमान्यता है
चार-दो-एक-सात वाली गिनती, और यह कि उल्टी दिशा में घुमाने से दोष लगता है — ये परंपराएँ हैं। ये सब जगह एक जैसी नहीं हैं, और किसी एक ग्रंथ से इनका मिलान हम नहीं कर सके।
जहाँ शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, हम उसे लोकमान्यता कहकर लिखते हैं —
और जहाँ ग्रंथों में मतभेद है, वह भी बता देते हैं।