संक्षेप में उत्तर
"प्रसाद" का अर्थ है कृपा या प्रसन्नता। जो देवता को अर्पित किया गया, वह लौटकर भक्त को मिलता है — यही उसका भाव है।
यानी प्रसाद देवता का दिया हुआ है, हमारा लाया हुआ नहीं — यही उसकी पूरी बात है।
यह लोकमान्यता है — शास्त्रीय प्रमाण हमें नहीं मिला
परंपरागत मान्यता
भोग अर्पित किया जाता है, फिर वही प्रसाद रूप में बाँटा जाता है। मंदिरों के अपने-अपने प्रसिद्ध प्रसाद हैं और वे शताब्दियों से वैसे ही चल रहे हैं।
प्रसाद को अस्वीकार करना या फेंकना अनुचित माना जाता है — यह नियम बहुत दृढ़ता से माना जाता है, चाहे कितनी भी थोड़ी मात्रा हो।
शास्त्रीय संदर्भ
इस विषय पर हमें कोई निश्चित ग्रंथ-संदर्भ नहीं मिला। नीचे जो लिखा है वह
परंपरा और व्यवहार पर आधारित है — शास्त्र-वचन के रूप में न लें।
सरल व्याख्या
प्रसाद में एक बात है जो धर्म से आगे जाती है: वह बँटता है, और बराबर बँटता है। मंदिर के आगे खड़ी पंक्ति में सबको वही मिलता है और उतना ही मिलता है।
कई बड़े मंदिरों की अन्नक्षेत्र-परंपरा इसी भाव का बड़ा रूप है — और वह आज भी लाखों लोगों को भोजन देती है।
क्या प्रमाणित है
यह कि "प्रसाद" शब्द का अर्थ कृपा है, और यह कि अर्पित भोग का प्रसाद रूप में बाँटा जाना भारतीय मंदिर-परंपरा का बहुत पुराना और सर्वव्यापी अंग है।
क्या लोकमान्यता है
प्रसाद के विशेष फल, उसे किस हाथ से लेना, कितना लेना — ये परंपराएँ हैं। इनका कोई एक निश्चित ग्रंथ-आधार हमें नहीं मिला।
जहाँ शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, हम उसे लोकमान्यता कहकर लिखते हैं —
और जहाँ ग्रंथों में मतभेद है, वह भी बता देते हैं।