संक्षेप में उत्तर
दीपक अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का प्रतीक है — अज्ञान से ज्ञान की ओर।
यह भाव वैदिक प्रार्थना "तमसो मा ज्योतिर्गमय" जितना पुराना है, पर "मंदिर में दीपक इसीलिए जलता है" — यह जोड़ परंपरा का है।
यह लोकमान्यता है — शास्त्रीय प्रमाण हमें नहीं मिला
परंपरागत मान्यता
दीपक के बिना कोई पूजा पूरी नहीं मानी जाती। पंचोपचार और षोडशोपचार — दोनों पूजा-पद्धतियों में दीप-दर्शन एक अलग उपचार है।
परंपरा में घी का दीपक श्रेष्ठ माना जाता है, तेल का उससे नीचे; बत्ती की दिशा, दीपक की संख्या और किस देवता के आगे कौन सा दीपक — इन सब पर क्षेत्र-क्षेत्र में अलग मान्यताएँ हैं, और वे एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं।
शास्त्रीय संदर्भ
इस विषय पर हमें कोई निश्चित ग्रंथ-संदर्भ नहीं मिला। नीचे जो लिखा है वह
परंपरा और व्यवहार पर आधारित है — शास्त्र-वचन के रूप में न लें।
सरल व्याख्या
दीपक का भाव सीधा है: जहाँ प्रकाश है, वहाँ देखा जा सकता है। पूजा में उसे भीतर के अंधकार पर लागू किया जाता है।
एक व्यावहारिक पक्ष भी था, जिसे आज भुला दिया जाता है — गर्भगृह प्रायः बिना खिड़की का, पत्थर का बना होता है। वहाँ दीपक ही एकमात्र प्रकाश था।
क्या प्रमाणित है
"तमसो मा ज्योतिर्गमय" — अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलने की यह प्रार्थना उपनिषद्-परंपरा की है और बहुत प्राचीन है। दीप-दर्शन का पूजा-पद्धति में एक स्वतंत्र उपचार होना भी स्थापित है।
क्या लोकमान्यता है
घी का दीपक तेल से अधिक फल देता है; बत्ती किस दिशा में हो; दीपक बुझ जाना अशुभ है — ये सब परंपरागत मान्यताएँ हैं, और अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हैं। हमें इनके लिए कोई निश्चित ग्रंथ-संदर्भ नहीं मिला।
जहाँ शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, हम उसे लोकमान्यता कहकर लिखते हैं —
और जहाँ ग्रंथों में मतभेद है, वह भी बता देते हैं।