संक्षेप में उत्तर
परंपरा में घंटी का स्वर देवता को अपने आने की सूचना देने और अपने मन को बाहर की बातों से हटाकर एक जगह लाने के लिए बजाया जाता है।
यह मुख्यतः आगम-परंपरा और मंदिर की व्यवहार-पद्धति से आया है — किसी एक सर्वमान्य ग्रंथ-वचन से नहीं।
यह लोकमान्यता है — शास्त्रीय प्रमाण हमें नहीं मिला
परंपरागत मान्यता
मंदिर में प्रवेश करते समय, दर्शन से पहले घंटी बजाने की परंपरा लगभग पूरे भारत में है। इसके साथ प्रायः यह श्लोक बोला जाता है:
आगमार्थं तु देवानां गमनार्थं तु रक्षसाम्।
कुर्वे घण्टारवं तत्र देवताह्वान लाञ्छनम्॥
अर्थ — देवताओं के आगमन के लिए और नकारात्मक शक्तियों के जाने के लिए मैं घंटा बजाता हूँ; यह देवता के आह्वान का चिह्न है।
यह श्लोक बहुत व्यापक रूप से बोला और छापा जाता है, परंतु यह किस ग्रंथ के किस अध्याय का है, यह हम निश्चित रूप से नहीं बता सकते। इसलिए इसे यहाँ परंपरा में रखा गया है, प्रमाण में नहीं।
शास्त्रीय संदर्भ
इस विषय पर हमें कोई निश्चित ग्रंथ-संदर्भ नहीं मिला। नीचे जो लिखा है वह
परंपरा और व्यवहार पर आधारित है — शास्त्र-वचन के रूप में न लें।
सरल व्याख्या
तीन कारण सामान्यतः बताए जाते हैं:
१. ध्यान एक जगह आता है। बाहर से आया हुआ मन घंटी के स्वर पर टिकता है, और दर्शन के समय वही एकाग्रता चाहिए।
२. सूचना का भाव। किसी के घर जाएँ तो द्वार खटखटाते हैं — देवता के घर में प्रवेश का वही भाव घंटी में है।
३. स्वर की अवधि। धातु की घंटी का नाद देर तक गूँजता है; परंपरा में इसे शुभ माना गया है।
ध्यान रहे — कुछ मंदिरों और सम्प्रदायों में घंटी नहीं बजाई जाती। यह भी परंपरा का ही भाग है, कोई भूल नहीं।
क्या प्रमाणित है
यह कि घंटी बजाना आगम-आधारित मंदिर-पूजा की एक व्यापक और बहुत पुरानी व्यवहार-परंपरा है। और यह कि सब मंदिरों में यह अनिवार्य नहीं है।
क्या लोकमान्यता है
यह कि घंटी के स्वर से नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं, और यह कि उसका नाद एक निश्चित समय तक गूँजना ही शुभ का प्रमाण है। ये मान्यताएँ हैं — इनके लिए हमें कोई निश्चित शास्त्र-वचन नहीं मिला।
संदर्भ
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आगमार्थं तु देवानां — प्रचलित श्लोक
(लोकमान्यता — tradition, no text claimed)
हर पूजा-पद्धति की पुस्तक में छपता है, पर मूल ग्रंथ और अध्याय हम निश्चित नहीं कर सके।
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मंदिर की आगम-आधारित व्यवहार परंपरा
(लोकमान्यता — tradition, no text claimed)
दक्षिण और उत्तर दोनों की मंदिर-पद्धति में प्रचलित।
जहाँ शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, हम उसे लोकमान्यता कहकर लिखते हैं —
और जहाँ ग्रंथों में मतभेद है, वह भी बता देते हैं।