संक्षेप में उत्तर
जलाभिषेक शिव-पूजा का मूल रूप है — शिव "अभिषेकप्रिय" कहे जाते हैं, यानी उन्हें अभिषेक प्रिय है, जबकि विष्णु को अलंकार।
सावन और शिवरात्रि में जल चढ़ाने की परंपरा इसी से जुड़ी है।
यह लोकमान्यता है — शास्त्रीय प्रमाण हमें नहीं मिला
परंपरागत मान्यता
सामान्य जल, गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर — इन्हें मिलाकर पंचामृत अभिषेक होता है। बेलपत्र इसके साथ चढ़ाया जाता है।
एक बहुत प्रचलित कथा समुद्र-मंथन की है: हलाहल विष पीने के बाद शिव का कंठ जलने लगा, और उन्हें शांत करने के लिए जल चढ़ाया गया। सावन में जलाभिषेक की परंपरा को प्रायः इसी से जोड़ा जाता है।
यह कथा पुराणों की परंपरा में है, परंतु "इसीलिए सावन में जल चढ़ता है" — यह जोड़ लोक-परंपरा का है।
शास्त्रीय संदर्भ
इस विषय पर हमें कोई निश्चित ग्रंथ-संदर्भ नहीं मिला। नीचे जो लिखा है वह
परंपरा और व्यवहार पर आधारित है — शास्त्र-वचन के रूप में न लें।
सरल व्याख्या
शिव की उपासना का रूप ही सादा है — जल, बेलपत्र, भस्म। न वस्त्र, न आभूषण, न विशेष सामग्री। "भोलेनाथ" नाम इसी सादगी से आया है।
इसीलिए जलाभिषेक सबसे गरीब भक्त के लिए भी उतना ही सुलभ है जितना किसी और के लिए — और परंपरा में यही उसकी विशेषता मानी गई है।
क्या प्रमाणित है
यह कि जलाभिषेक शिव-पूजा का केंद्रीय और बहुत प्राचीन रूप है, और यह कि शिव उपासना अपनी सादगी में अन्य देवताओं की पूजा से भिन्न है।
क्या लोकमान्यता है
समुद्र-मंथन की कथा से सावन के जलाभिषेक का सीधा संबंध; किस दिन कितना जल; किस पात्र से — ये परंपराएँ हैं। हमें इनका कोई निश्चित ग्रंथ-संदर्भ नहीं मिला।
जहाँ शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, हम उसे लोकमान्यता कहकर लिखते हैं —
और जहाँ ग्रंथों में मतभेद है, वह भी बता देते हैं।